घरों के सामने फैले बिजली के तारों के अनोखे राज | टुल्लू क्यो जल जाता है आपका जाने यहाँ पर | Jhusi Gyaan

ये बात शायद आपको कोई न बताए। 
पर शायद आपने खुद से जानने की कोशिश की हो। कौतूहल तो हुआ ही होगा। थोड़ी कोशिश के साथ आपको शायद पता भी चल गई हो ये बात। पर बहुत से लोगो को अभी भी इसके बारे मे नहीं पता, ये जानकारी सभी के लिए है। 
फोटो देखकर अंदाजा तो लग ही गया होगा। जी हाँ, हम झूसी मे फैले इन बिजली के तारो को बात कर रहे हैं। लगभग सभी के घरो के सामने से कुछ ऊंचाई पर बिजली के पोल से 4-5 मोटे-मोटे तार समांतर क्रम से गए है। पूरा झूसी इससे घिरा हुआ है। झूसी मे इन सभी बिजली के तारो का संचालन आपके झूसी पवार-हाउस से होता है। इसका एक सबस्टेशन अपने त्रिवेणीपुरम मे भी है। डिविसन ऑफिसर वही बैठते हैं।

चलिये सीधे मुददे पर ही आते हैं। आखिर इन तारो का क्रम क्या है ? ये ऐसे क्यो लगे हैं ? क्या हमको-आपको इनसे खतरा है ? इनकी सही संख्या क्या है ? 
बहुत सारे सवाल है जिनके जवाब आज आपको मिल जाएंगे। 

ज्यादा तकनीकी नहीं, सीधी भाषा मे आपको बताते हैं ये सब। दरअसल इन सभी बिजली के तारो का काम आपके घरो मे 220 वोल्ट की नियमित सप्लाई देना है जिससे आपके घर के सारे बिजली वाले काम होते हैं। घरो मे इस्तेमाल होने वाले सभी यंत्र लगभग इसी नियम के अंतर्गत बनाए गए होते हैं। 220 वोल्ट से सप्लाई ज्यादा आने पर उपकरणो के जल जाने 

या खराब होने का खतरा होता है। कभी-कभी बिजली विभाग की तरफ से गलती से सप्लाई ज्यादा आने पर झूसी मे अक्सर टुल्लू जल जाने, फ्रिज खराब हो जाने, शॉर्ट सर्किट हो जाना आदि अनेक समस्याएँ होती रहती है। बिजली-विभाग की कोशिश यही रहती है कि 220 वोल्ट सप्लाई को निरंतर बनाए रखा जाये क्योकि इससे कम होने पर तो उपकरण चल भी 

नहीं पाते हैं और लो-वोल्टेज जैसी परेशानी होनी लगती है। आपने कूलर, पंखा आदि लो वोल्टेज होने पर धीमे-धीमे चलते देखा होगा।  कभी-कभी तो चल भी नही पाते। ये सब सप्लाई 220 वोल्ट से कम आने पर होता है। 

आइये अब बिजली के खंभों पर लगे तारो को देखते हैं। 
 हर जगह बिजली के तारो का क्रम अलग-अलग हो सकता है पर अधिकतर और झूसी मे भी थ्री फेज रूल से ही तारो को फैलाया गया है। हमारे घरो मे बिजली आने के लिए 'एक फेज और एक न्यूट्रल' का कनेक्शन चाहिए होता है। 
बिजली-विभाग की तरफ से झूसी मे बिजली के पाँच तार फैलाये गए हैं। आप फोटो देखिये। ऊपर के 1, 2 और 3 नंबर के तार, फेज तार है। ये दिखने मे थोड़े ज्यादा मोटे हैं। 
5वे नंबर का तार 'अर्थ' का है, इसे ही कभी कभी 'न्यूट्रल' भी कहते हैं। 

उदाहरण के तौर पर, झूसी मे किसी के घर बिजली की सप्लाई देनी है तो 1,2 या 3 मे से किसी भी एक से 'फेज' की सप्लाई दे देंगे और न्यूट्रल(अर्थ) जरूर से नीचे वाले 5वे नंबर के तार से देंगे।



बाकी बचे तारो के बारे मे भी बताते हैं आपको,

4थे नंबर वाला तार स्ट्रीट-लैम्प के लिए दिया होता है। इसे कॉलोनी मे ट्यूब लाइट आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बिजली-विभाग का इससे ज्यादा काम नही होता है।

और ये 6वे नंबर का तार 😀😀😃
ये बिजली-विभाग का नही, ये आपके लोकल टीवी केबल वाले भैया का है।

आखिर मे, बता दे कि ये जानकारी सिर्फ आपके ज्ञान को बढ़ाने के लिए दी गयी है, आप इन तारो को छूने, इनके पास जाने या इनमे कटिया फसाने की कोशिश न करे। ये आपके लिए जानलेवा हो सकता है।
 .

(Photo: नई झूसी, गोला बाजार)

Jhusi Jindabad | Episode - 2 | Hindi Story

झूसी जिंदाबाद- एपिसोड-2

जब मैंने उसे छिपकली कहा तो उसने मुझे गुस्से से ऐसे घूरा कि अगर भारत मे एक कत्ल करना माफ होता तो वो मुझे मार देती। वही दूसरी तरफ उसकी दोनों दबंग सहेलियाँ मुझे देख के हँस रही थी, उनकी हँसी से इतना तो मुझे जरूर समझ मे आ गया कि आज घर पर ये दोनों  इसकी खूब खिचाई करने वाली हैं, और वो मुझे रात भर गालियाँ देने वाली है।
वैसे गालियों से तो मुझे मेरे दोस्तों ने भी न्यायनगर, अक्षय-वाटिका तक जाते-जाते पूरे रास्ते भर नवाजा। सागर ने ओरहन देना शुरू किया, 'ससूर के रहा न जा रहा था तुमसे बिना मुंह खोले?' विक्की ने भी प्रवचन सुनाया, 'बेटा मुंह खोले वो तो ठीक पर इलाहाबादी अल्हड़पन तो तुम्हारा जाना नही है, पूरे बैल बुद्धि हो ससूरे तुम, अबे चश्मा और टोपी तक तो ठीक था पर ये छिपकली का सोच के बोल दिये बे?'

हम शांति से उन दोनों को सुन रहे थे, 'राहुल महाशय , अब मुंह नहीं खोलोगे? बोलोगे भी कुछ या बस यूं ही?' अब हमने जवाब दिया, 'अरे यार! कुछ समझ मे  नही आया बस उसे देखते ही रह गए, जानते हो विक्की उसकी शक्ल से ज्यादा तो हमे उसका बचपना भा गया यार, बिलकुल बच्चों कि तरह पैर पटकती है यार, जैसे किसी बच्चे को बिस्कुट न मिले तो पैर पटक के रोने लगता है उसे भी फुलकी के लिए पैर पटकते, मुंह सिकोड़ते हुवे देखा तो लगा कि अब न रो दे ये, एक बार तो सोचा गुप्ता जी से कह दूँ, भाई पहले मैडम को दे दो'।  विक्की बौखलाते हुवे बोले, 'ससूर के जैसे पैर पटक रही थी ना वैसे ही तुमको भी पटकेगी, देखे नहीं कैसे बौराई थी जब छिपकली कहे हो, ना जाने इंग्लिश मे क्या-क्या गरिया दी, उ तो सुने ना होगे तुम, देखे लो फिर न कहना कि हम कुछ बोले नही'।
हमसे भी अब बरदास न हुआ और झल्ला के बोले, 'जो हुआ सो हुआ, बस इतना जान लो ससूर कि भौजाई तुम्हारी वही छिपकली बनेंगी'। सागर बोले, 'का पता पहले से ही किसी भैया की बन गई हो और हंसने लगा'। हमने कहा, 'भाई की खुशी बर्दाश्त न होगी तुमसे पता था हमे'।
विक्की  बोले, 'अबे मान लो कोई हुआ तो'।  हम कहे, 'अरे! क्यो मान ले बे? तुम ससूर के मोराल डाउन मत करो हमारा और हाँ कल से रोज पावर-हाउस तक घूमने चलना है, का पता किस्मत सही रहे तो दिख जाएगी'।



सागर जी बोले, 'हाँ गुरु कल से तुम्हारे लिए पावर हाउस तक की सैर शुरू, बस किसी तरह नाम और क्लास पता चल जाये तो बाकी का काम तो तुम्हारी भौजाई से करवा लेंगे'
हमने कहा, 'सीखो विक्की, इसे कहते हैं मित्रता, अबसे बेस्ट फ्रेंड वाले निबंध मे हम तुम्हारा नाम नहीं सिर्फ सागर की ही नाम लिखेंगे'। विक्की कहे, 'हाँ तो ठीक है कल से इसी के साथ जाना, हम नहीं चलेंगे'। हम हँसते हुवे बोले, 'अबे मज़ाक कर रहे हैं समझे', खैर अब हम तीनों का घर आ गया था, हम तीनों अपने-अपने घर को चल दिये। आज खाना खाने के बाद मै अपने कमरे मे आया सोचा कुछ पढ़ लूँ  पर दिमाग मे तो वो छिपकली ही थी, मैंने भी कंबल ओढ़कर सोने मे ही भलाई समझी।

आज रात नींद कहाँ आनी थी, बस उसकी ही प्यारी सी सूरत सामने आ जा रही थी। इठलाते हुवे 'ऊ ऊ कितनी ठंडी है' कहते हुवे दोनों हाथो की हथेली को रगड़ती हुई तो कभी अपनी छिपकली प्रिंटेड टोपी को खिचते हुई मानो वो सिर्फ अपने कान ही नही पूरा मुँह ढकना चाहती हो उससे। मुझे तो ऐसा लग रहा था की वो बिलकुल मेरे सामने खड़ी हो और अपने टोपी से अपना मुँह ढकना चाह रही हो और मै भी प्यार से उठता हूँ और उसे बड़ी वाली मंकी कैप पहना देता हूँ, इस मंकी कैप पर भी सामने की तरफ कुछ लकीरों की कोई डिज़ाइन बनी होती है, थोड़ा और ध्यान से देखने पर छिपकली की प्रिंटिंग दिखने लगती है,  बस उसी के बारे मे सोचते-सोचते न जाने कब नींद आ जाती है। 

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(कहानी पसंद आए तो कमेंट करे, कोई सुझाव हो तो बताए)

Jhusi Jindabad | Episode - 1 | Hindi Story

छिपकली, हाँ जी हाँ छिपकली। बेहद अजीब सा नाम है न ? पर मेरे लिए तो वो हमेशा छिपकली ही बनी रहेगी।
उसका नाम नही जानता था मै, पहली बार झूसी लाल-चौक पर उसको देखा था। ठंड वाला शाम का मौसम था और वो अपनी दो दबंग सहेलियों संग गुप्ता-चाट के सामने मोमोज चेपने मे लगी थी और हम अपने प्रिय मित्रों सागर और विक्की के साथ गुप्ता-चाट के यहाँ फुलकी गपगपा रहे थे। 
झूसी मे गुप्ता-चाट की फुलकी हमारी पसंदीदा है क्योकि उनके बड़े-बड़े फुलको मे स्वाद तो होता ही है और वो गरमागरम भी होती हैं, किसी और के यहाँ ये बात नही। खैर फुलकी के बाद हम तीनों ने अब एक प्लेट दही-बड़ा ले लिया था, एक प्लेट मे तीन चम्मच के साथ हम तीनों लगे हुए थे। ये होती है असली दोस्तो वाली शेयरिंग, जो की झूसी के लड़को मे आसानी से देखी जा सकती है। 

वैसे तो हमारा पूरा ध्यान दही-बड़े पर ही था क्योकि हमे पता था की जरा सा भी ध्यान भटका तो ये कमीने उतने मे सारा निपटा देंगे पर तभी सामने मोमोज की दुकान से एक प्यारी सी लगभग चिल्लाती हुई आवाज आई, 'ओह, सिट यार! कितना गरम है यार उफ्फ'। मैंने उधर देखा तो एक लड़की पैर पीटते हुवे मुंह से गरम हवा निकलते हुवे हाथो से पंखा कर रही थी, उसकी दोस्त पीठ को सहलाते हुवे, 'यार तुझे ध्यान से धीर-धीरे खाना चाहिए था, तू हमेशा जल्दबाज़ी करती है', इतना कह कर सहेली ने पानी का ग्लास उसकी तरफ बढ़ाया।  उसने एक घूट मे ही ग्लास भर पानी पी लिया, शायद बहुत तीखे मोमोज रहे होंगे, पर ये सब देखकर मुझे हंसी आ रही थी और मै मुस्कुरा रहा था। 

संजोग से हम दोनों की नजरे टकराई और मुझे मुस्कुराता देख उसने मुझे गुस्से से ऐसे घूरा मानो मैंने उससे उष्मागतिकी का फार्मूला का पूछ लिया हो। मैंने भी धीरे से नजरे झुकाई और वापस नजरे दहि-बड़े की तरफ केन्द्रित की पर साहब यहाँ तो जरा सी सावधानी हटते ही दुर्घटना घट चुकी थी, दही-बड़े वाली प्लेट पूरी खाली हो चुकी थी। सागर ने मज़े लेते हुवे कहाँ, 'गुरु! या तो दही-बड़े खा लो, या नजरे मिला लो'। 

विक्की ने भी सागर की हाँ मे हाँ मिलाते हुए बेशरमों की तरह चम्मच डस्टबिन मे रखते हुवे बोला, 'अबे वो छोड़ो, बहुत दिनों से गुप्ता जी की चाट नहीं खाई, आज भी नही खाई तो बेचारे बुरा मान जाएगे'। 

वैसे लगता था आज किस्मत भी यही चाहती थी की हम चाट ही खाये, क्योकि अब मैडम मोमोज खाकर गुप्ता-चाट की दुकान पर आ गयी। उनकी दूसरी तरफ हम लोग अभी खड़े थे। मैडम ने अपनी मीठी आवाज मे आर्डर दिया ,'भैया, तीन प्लेट फुलकी'। अब तो हम भी वहाँ रुकना चाहते थे। मैंने विक्की से कहाँ, 'यार हाँ, चाट खाये तो बहुत दिन हो गए, चल खाते हैं'। अब सागर बाबू मुस्कुराते हुए बोले, 'खा तो लेंगे, पर आज का पूरा बिल तुम दोगे'। ना चाहते हुए भी मुझे हाँ कहना पड़ा। 

इतना सुनते ही सागर ने झट से बोला, 'ओ भाई! तीन जगह चाट लगाना'। उधर से जवाब आया भैया, बस दीदी लोगो को फुलकी खिला दे फिर देते हैं, मैंने भी मुस्कुराते हुवे कहा, 'कोई बात नहीं भईया, अब आप हमारी बात पहले कहाँ सुनेगे'। इतना सुनते ही वो मेरी तरफ देखी मैंने भी मुस्कुरा के उसकी तरफ देखा, इस बार उसने मुझे घूरने के बजाय एक प्यारी मुस्कान के साथ देखा फिर नजरे झुका ली। 


मै तो बस उसकी तरफ देखता ही रह गया। उसने सफेद और महरून रंग की मखमली टोपी लगाई थी उस पर उभरी हुई  छिपकली कि आकृति बनी थी, कुछ ज्यादा तो समझ मे नहीं आया पर जो भी था वो छिपकली मुझे बहुत प्यारी लग रही थी, कलाई मे तीन-चार रंग के बैंड सरीखे कुछ बंधा हुआ था, शायद फ्रेंड्शिप बैंड हो और आंखो मे बिल्ली-कट फ्रेम वाला चश्मे लगाए एकदम मासूम और पढ़ाकू लग रही थी, हरकते भी उसकी बिलकुल बच्चो जैसी थी। अचानक से दोनों हाथों की  हथेली रगड़ते हुवे 'ऊ ऊ कितनी ज्यादा ठंडी है', कह कर मुंह से भाप निकालती, तो कभी अपनी जैकेट के ज़ेबो मे दोनों हाथ डालकर उछलने की कोशिश करती हुई पैर पीटकर इठलाते हुवे कहती, 'भईया, जल्दी फुलकी खिलाइये न' 

मै एक बार फिर से उसकी इन प्यारी अदाओ मे खो गया। तभी सागर ने कोहनी मारी, 'ससूर के हवशी मत बन जाओ, जरा प्यार से देखो'। मैंने कहा, 'प्यार से ही तो देख रहा हूँ, अब क्या जाकर गले लगा लूँ तभी समझोगे की प्यार से देख रहा हूँ'। अब तक शांत विक्की बोल पड़ा, 'साले इतना भी प्यार से देखने को नहीं कह रहा है, सच मे हवसी हो गए हो'। हम तीनों हंसने लगे। उधर वो लोग भी अब फुलकी का आखिरी राउंड निपटा रही थी, मैंने कहा, 'गुप्ता सेठ, अब तो हम लोगो को भी चाट खिला दीजिये', ये सुनकर उधर मैडम भी फुलकी खाते हुवे धीरे से मुस्कुरा दी, हमने उन्हे देखा तो नजरे झुका ली, शायद वो भी समझ रही थी कि हम यहाँ उन्ही के लिए रुके है, अब अगर लेट हुआ तो रुकना व्यर्थ हो जाएगा। 

खैर हम लोगों को चाट मिल गयी,  मैंने कहा, 'ससूर के जल्दी-जल्दी ठूसो, साथ मे ही चलना है'।  विक्की ने चम्मच मुंह से निकालते हुए बोला, 'अबे छिछोरगिरी करते हुवे पीछे नहीं जाना हमे'।  हम विक्की को कुछ बोलते उससे पहले ही सागर ने विक्की को एक कंटाप लगाते हुवे कहा, 'ससूर के साल भर पहले भौजाई के लिए, पावर-हाउस से लाल-चौक, लाल-चौक से छतनाग खूब करवाए हो, ज्यादा शराफतअली न बनो, तब तो ये छिछोरपंती तुम्हें प्यार कि पहली सीढ़ी नजर आती थी, नौटंकी मत कर जल्दी से खा'। 

इसी दौरान अचानक कहीं से एक छोटा छिपकली का बच्चा, मैडम के पैर के पास से निकला,  मैडम चिल्लाने लगी 'छिपकली-छिपकली, पैर के नीचे छिपकली,' हटो यार, हटो, मुझे छिपकली से बहुत डर लगता है', कहकर उछलने-कूदने लगी। अब तो ये देख कर हमारी हंसी रुकी ही नही, हम खिलखिला के हंसने लगे और तपाक से मुंह से निकला, 'घबड़ाइए नही, एक छिपकली दूसरी छिपकली को काटती नही'। इस पर तो सभी लोग लोग हंसने लगे। उधर मैडम गुस्से से लाल पीली होने लगी, और 'माइंड योर ओन बीजनेस' बोल के बिल पूछा। ये देख हमने और सागर ने एक ही बार मे बची हुई चाट ठूस लिया पर विक्की भाई साहब अभी भी कटोरी मे चम्मच मारने मे ही लगे थे। ये देख सागर ने विक्की से बोला, 'अबे जल्दी करो'।  विक्की ने तुनक के थोड़ा तेज़, उन्हे सुनाकर कहा, 'खा लेंगे तब तो चलेंगे, इतनी जल्दी क्या है'। हमने गुप्ता जी से कहा, 'पैसे इससे ले लीजिएगा, ये आराम से आएगा, चलो बे सागर'। इतने मे विक्की, 'अबे रुको बे, हो गया' कहकर झटपट कटोरी और चम्मच डस्टबिन मे और चाट पेट मे। ये सब देखकर वो तीनों हंसने लगी, गुप्ताजी और हम लोग भी हंसने लगे, मैंने मन ही मन चौवन फुट वाले हनुमान जी को धन्यवाद दिया की चलो वो हंसी तो, यानी नाराज़ नहीं है मुझ से। 

खैर आगे पैसे देकर हम लोग भी उन लोगो के साथ ही पावर-हाउस वाली रोड पर चलने लगे। काफी शांति से हम लोग चल रहे थे, न वो सब कुछ बोल रही थी, न ही हम लोग। अमृत-स्वीट-हाउस आ चुका था, मुझसे रहा न गया मैंने कहा, 'यार सागर, सोच रहे हैं कि मोमोज भी खाने चाहिए थे'। विक्की ने कहा, 'चलो तो फिर चलते हैं'। सागर ने ठोकते हुवे विक्की को कहा, 'कल के लिए भी कुछ रहने दो मालिक'। 

हम सब अब पावर-हाउस पहुँचने गए थे, वो तीनों शायद टेम्पो का इंतज़ार कर रही थी, हम लोग भी साथ मे यूही खड़े हो गए।  मैंने कहा, 'यार ठंड बहुत है, ये मैडम के जैसे एक टोपी ले लेना चाहिए छिपकली वाला'। ये सुनते ही सागर ने मज़ाकिया अंदाज़ मे कहा, 'हाँ ससूर के नाती, और तुम चश्मा भी ले लो अब उनके तरह और पूरा बिल्ली बन जाओ'। वो तीनो भी अब मुंह दबाकर हँस रही थी। तभी चुंगी-चुंगी करते एक अप्पे आई और वो तीनों अब चुंगी जाने वाली अप्पे मे बैठने ही वाली थी तभी पता नहीं क्या सूझा कि मैंने तेज़ से चिल्लाया, 'वैसे मखमली टोपी मे छिपकली बहुत प्यारी लगती है'। वो मेरी तरफ मुड़ी और तेज़ी से घूरा मुझे जैसे मेरी दोनों किडनी निकाल लेगी। मैंने दोनों हाथो से कान को पकड़ा और माफी मांगने का इशारा किया और वो तुनक कर मुंह दूसरी ओर घूमा लिया और हम उसे ही देखते रह गए। 

खैर टेम्पो अब चल दी, उसकी दोनों सहेलिया तो हँस रही थी पीछे मुड़कर पर वो जब मुड़ी तो वही गुस्से से लाल और हम सिर झुकाये सोच रहे थे की ये क्या बोल दिया मैंने, वो मेरे बारे मे कितना गलत सोच रही होगी, बेवजह नाराज़ कर दिया उसे। 

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Famous Schools & Colleges of Jhusi Prayagraj

(1). M P BIRLA SHIKSHA BHAWAN & INTER COLLEGE,
            LOCATION: CHHATANAG, JHUSI PRAYAGRAJ






(2) NEW R S J PUBLIC SCHOOL,
          CHATNAG, JHUSI, PRAYAGRAJ, PIN-211019






(3) MAHENDRA PRATAP INTER COLLEGE
            PREVIOUSLY KNOWN AS SHEMFORD PUBLIC SCHOOL





(4) CENTRAL ACADEMY,  JHUSI, PRAYAGRAJ







(5) SAROJ VIDYASHANKAR INTER COLLEGE,
           JHUSI, PRAYAGRAJ







(6) L M D INTER COLLEGE, JHUSI, PRAYAGRAJ

                           LALA MANMOHAN DAS INTER COLLEGE, JHUSI PRAYAGRAJ 







TILL FURTHER UPDATES

How to apply for Cheque Book for Bank of India | बैंक ऑफ़ इंडिया से चेकबुक घर बैठे कैसे इशू करें


एकदम सीधा और सरल उपाय

अपने मोबाइल फ़ोन जो की आपके बैंक अकाउंट में रजिस्टर हो
उससे एक SMS भेजिए 9212304242  पर

अंग्रेजी के कैपिटल अक्षर में लिखिए
CHBS अकाउंट नम्बर ADR 

अगर चेकबुक अपने बैंक के ब्राँच में मंगवाना हो तो तो टाइप करिये

CHBS अकाउंट नम्बर BR 

नोट: अकाउंट नंबर की जगह आपका बैंक-अकाउंट नंबर लिखा जाएगा


इसके बाद आपके फ़ोन में आपके रिक्वेस्ट का मैसेज आ जायेगा

और आपकी चेकबुक 15 दिनों में आ जायेगी





झूसी की बरसात | Rain Story






आज झूसी की बरसात में घर के पास बाढ़ जैसा माहौल देख बहुत गुस्सा आ रहा था,
तभी, हमारे चिंटू की मम्मी ने बताया कि आपको अभी सब्जी लेने जाना है,
बस हमारे चहेरे की हवाइयां उड़ गयी
इतना सुनते ही तुरंत मशीन फलो में आ गयी ,
दिमाग ने अपना त्वरित कैलकुलेशन चालू किया,
सब्जी लेने बाहर जाना है,
यानी न्यायनगर मार्किट तक,
जो कि रोड के उस पार है,
मतलब पावर-हाउस तक तो जाना होगा रोड क्रॉस करने के लिए,
पूरे आठ सौ मीटर फिजूल की सरकस,
और वापसी में फिर से पावर-हाउस से क्रॉस करने की मुसीबत,
और तो और रोड पर पूरा किचकिच हुवा है, कपड़े तो जरूर गंदे होंगे,
पर चिंटू की मम्मी सीधी बात समझेगी नहीं,
क्या बोलू उसको,
आज बरसात में भी चिंटू को सेंट्रल-अकेडमी भेज दिया था उसने तो,
एग्जाम जो चल रहे हैं
और अब मुझे भी, सब्जी लेने के लिए जाना होगा
मन तो नहीं है जाने का,,
पर क्या करू ? क्या करू ??
.
तभी पीछे से चिंटू की मम्मी ने आवाज दी ,
एजी, रहने दीजिये,
इतनी बरसात में आप कहाँ जाएंगे ?
आज की सब्जी तो हो जायेगी
कल की कल देख लेंगे
बाहर बहुत पानी भरा है
पावर-हाउस तक जाके रोड क्रॉस करने में ही
पूरे कपड़े भीग जायेंगे,
चिंटू, अपने पापा को अंदर बुला लो
.
अपने मन की बात इस तरह सुन कर,
मै आवाक और स्तब्ध सा हो गया,
आँखे चिंटू की मम्मी को एकटक देखने लगी,
होठों पर शरारती मुस्कान तैर रही थी,
...मै यादों में खो गया
वो आज भी मेरी हर बात बिना बोले समझ लेती है
चिंटू की मम्मी और हमारी मुलाकात, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हुवी थी
वो क्लास में आगे की बेंच में बैठती थी, होशियार जो ठहरी
और हम उसके तिकोने, पैतालीस डिग्री के सटीक एंगल पर,
जहाँ टीचर ही क्या, परिंदा भी पर न मार सके,
वो अक्सर, सवाल खत्म होने से पहले ही जवाब दे दिया करती थी,
उलटे हम, केमिस्ट्री तो पहले से ही मिस्ट्री थी हमरे लिए,
जब तक सवाल समझ में आता तब तक, दूसरे क्लास की बारी आ चुकी होती,
वो अपने बालों में लगी ब्लैक-रिबन को सही करके,
फिर अगले टीचर के साथ, रैपिड सवाल-जवाब में लग जाती,
खैर उसके चेहरे की चमक ने
हमारे पैतालीस डिग्री के तिकोने में अपनी रौशनी बिखेरनी शुरी कर दी थी,
मै अक्सर सोचता आज तो उससे बात करूंगा,
वो ये सब कैसे करती है,
ये राज पूछूंगा, पर कुछ समझ में नहीं आ रहा था
कुछ ज्ञानी दोस्तों ने सुझाव दिया की उससे उसकी कॉपी मांग लो
बोलना कुछ छूट गया है पूरा करना है,
आगे मै समझ गया था कि उससे कैसे बात करनी है
अब मुझे अगले दिन का इंतज़ार था
.
.
तभी चिंटू चिल्लाया, देख लिया मम्मी,
पापा भी इतनी बरसात में कही नहीं जाना चाहते और
हमें आज स्कूल भेजा था
कल तो कैसे भी नहीं जायेंगे,
चलो, अब रिमोट दे दो,
कार्टून देखना है  

झूसी का सफर - मेरी कहानी Part-1

जब "अरे, कोई पुलिया है ?" की आवाज, सर चढ़ कर बोलने लगे ,
समझ जाना, टेम्पो झूसी पहुंच चुकी है
रास्ते में काली माँ का मंदिर आया और फिर आगे पुलिस थाने से बकैतबाज़ों की आवाजे हलकी हलकी कानो पर आने शुरू होती है, फिर पेट्रोल-पंप तक पहुंचते ही, अनायास निगाहें कल्लन-चाय की तरफ घूम ही गई, उसके समीप ही प्रसिद्ध देशी-बुद्धिविकास-केंद्र दिखा, बाहर अंडे-चखने की व्यवस्था से अलौकिक माहौल बन रहा था
क्रमानुसार, पाल समोसा भी पलक झपकाते आगे आया, टेम्पो से बाहर देना बैंक और अनवर मार्किट की एकाध सवारियां उतरी, सामने ननका के स्वादिस्ट छोले और मठरी देख मुँह में पानी आना लाज़मी था, खैर अब टेम्पो रुकी नहीं, गोविन्द बल्लभ पंत संस्थान भी राह में दाहिने हाथ दिखा.. यहाँ एम बी ए की पढाई करने वाले बच्चो की चहल पहल जारी था ...
इनको देख याद आया ससुरा हमारा कैट का एग्जाम नज़दीक है और तैयारी के नाम पर नील बटे सन्नाटा है, आँखें दुःख से पनियाँ ही रही थी, तभी टैम्पो पाल चौराहा और चश्मा घर से आगे अब 'पावर-हाउस, पावर-हाउस' की आवाज पे रुक गयी जहाँ लगभग आधे लोग उतर लिए,
सवारियों में कोई एक नवयुवती ने 'हम तो इतना ही देते हैं' कह कर शायद कुछ एक रूपए कम दिए, खीज कर टैम्पो चालक ने कहाँ इसे भी रख लेव मैडम, खैर तब तक वो मोहतरमा जा चुकी थी और टैम्पो वाले ने असीम संयम का परिचय देते हुवे, 'पहचान लेव छोटुवा, अइसन को अब से नै बईठाइयो' का ज्ञान चेप दिया  

(...आगे जारी)

सर उठाकर जीने की राह | Jhusi Story



2 साल पहले परिवार में शादी के जबरदस्त दबाव के चलते झूसी में मुझे शादी के लिए एक सुंदर लड़की से मिलवाया गया...
मिलने के बाद लड़की ने मेरी प्राईवेट नौकरी को ले के नापसंद करते हुए मुझे Reject कर दिया...
मैंने खिसियाते हुए बोला कि तुम गलती कर रही हो, देखना 2 साल बाद यही नौकरी और मुझे कितना ऊपर ले जाएगी।
अलबत्ता,
उस समय एक-दो साल बाद उस लड़की की दारागंज में  शादी हो गई जो होनी ही थी।








2 साल बाद, अभी कुछ दिन पहले...


दोस्तों ने बताया कि पावर-हाउस के पास पुलिस वाले Bike वालों का हेलमेट और बाकी कागज चेक कर रहे और न होने पर, नए बढ़े हुवे ट्रैफिक-रेट से तगड़ा चालान काट रहे हैं



बस फिर मैंने घर से हेलमेट और बाकि कागज ले के चल दिया इलाहबाद-यूनिवर्सिटी की तरफ कुछ काम से, 

आगे मैने उसी खूबसूरत लड़की को उसके पति के साथ Brand New Audi कार में बालसन के पास  ट्रैफिक-सिग्नल पर देखा।





उस समय मैं अपनी Bike को किक मार रहा था, क्योंकि उसकी बैटरी काम नही कर रही थी।

उसने अपनी कार से मेरी तरफ देखा, लेकिन Helmet पहने होने से वह मुझे पहचान न सकी, और दूसरी तरफ देखने लगी।
उस समय मुझे *हेलमेट की अहमियत* का दिल से एहसास हुआ।
इसलिए अपनी सेफ्टी के लिए Helmet हमेशा अवश्य पहने !!
जो आपको सर उठाकर जीने की राह दिखायेगा।।
कभी शर्मिंदगी का एहसास नहीं होने देगा।
एक बात और सिर्फ़ फिल्मों मे ही आशिक़ 2-3 साल में करोड़पति बन जाते हैं । असल जिन्दगी मे 2-3 साल मे ज्यादा कुछ नहीं बदलता

 बस पुरानी Passion pro से नयी Glamour तक ही बदलाव हो पाता हैं ।

Please USE HELMET 
😜😂😂😂😂


Jhusi, Our Place | Jhusi Allahabad











"JHUSI @ALLAHABAD















Jhusi is a town and a nagar panchayat in Allahabad district in the Indian state of Uttar Pradesh.



JHUSI has an average elevation of 76 metres (249 feet). Jhusi is the biggest town area in Allahabad district. There is a Birla guest house and Harish-Chandra Research Institute near the bank of Ganges. This area also hosts the international headquarter of a famous spiritual organization, Vihangam Yoga on Chatnag road. This center is of great importance for meditation training apart many other things like ayurveda, acupressure etc. People come here from more than 40 countries to know more about spirituality and the path of God realization. GB Pant Social Science research center, Vishnu Temple, Ulta Kila (an old fort) are also here. The town has a huge religious importance, being at the bank of river Ganges and lying in the Kumbh Mela area.


DEMOGRAPHICS:-
As of 2001 India census, Jhusi had a population of 13,633. Males constitute 57% of the population and females 43%. Jhusi has an average literacy rate of 53%, lower than the national average of 59.5%: male literacy is 60%, and female literacy is 43%. In Jhusi, 13% of the population is under 6 years of ARC

HISTORY:-
Recently an archeological site near the confluence of the Ganges and Yamuna rivers called Jhusi yielded a C14 dating of 7100 BC for its Neolithic levels. Historically, Jhusi was known as Prathisthanpuram. It was burnt down by foreign invaders around 13-14th century and it came to be known as Jhulsi (Hindi word meaning burnt) the 'l' went missing as years passed on, became Jhusi.


Website
http://www.facebook.com/Jhusi